नौतपा शुरू होते ही अबूझमाड़ में गर्मी का कहर, पारा 43°C पार प्रकृति का बढ़ता तापमान मानो अबूझमाड़ को निगल रहा, खनन-कटाई से बिगड़ा संतुलन
नारायणपुर, छत्तीसगढ़
नारायणपुर, 25 मई 2026: आज से नौतपा शुरू हो चुका है और इसके साथ ही छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ में गर्मी ने विकराल रूप ले लिया है। जंगल की गोद में बसा यह इलाका तप रहा है और तापमान ने 43 डिग्री सेल्सियस का आंकड़ा पार कर लिया है। हालात ऐसे हैं कि मानो प्रकृति का बढ़ता तापमान धीरे-धीरे पूरे अबूझमाड़ को ही निगल रहा हो।
कभी ठंडा रहा अबूझमाड़, अब उगल रहा आग -
एक समय था जब अबूझमाड़ अपने घने जंगलों और सुहावने मौसम के लिए जाना जाता था। लेकिन अब यहां सूरज आग उगल रहा है। 6,640 वर्ग किमी में फैले नारायणपुर जिले का बड़ा हिस्सा अबूझमाड़ के अंतर्गत आता है, जहां नौतपा की शुरुआत ने ही गर्मी के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं।
खनन और कटते जंगल बने 'विलेन'
विशेषज्ञों के मुताबिक इस भीषण गर्मी की सबसे बड़ी वजह अंधाधुंध खनन और जंगलों की कटाई है। आमदई घाटी में 2016 से 192 हेक्टेयर वन भूमि पर लौह अयस्क का खनन चल रहा है। रावघाट में 700 मिलियन टन से ज्यादा लौह अयस्क का भंडार है। खनन के लिए अब तक 883.22 हेक्टेयर जंगल की जमीन दे दी गई और 7 हजार से ज्यादा पेड़ काटे जा चुके हैं।
विकास की कीमत चुका रही प्रकृति-
सड़क, रेलवे और उद्योगों के विस्तार ने भी जंगल को नहीं बख्शा। अनुमान है कि इन गतिविधियों से 5,000 एकड़ से ज्यादा वन क्षेत्र तबाह हो चुका है। बड़े पैमाने पर वन क्षरण से अबूझमाड़ का प्राकृतिक संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया है। नौतपा की तपिश में पेड़ों की कमी सीधे तापमान बढ़ा रही है।
20 साल बाद क्या बचेगा अबूझमाड़? -
स्थानीय लोगों के मन में सवाल है कि हजारों पेड़ों के कटने का खामियाजा कौन भुगतेगा? अगर खनन और कटाई की यही रफ्तार रही तो 10-20 साल बाद अबूझमाड़ की तस्वीर क्या होगी? विकास जरूरी है, लेकिन प्रकृति को निगलकर होने वाला विकास आखिर किसके काम आएगा?
फिलहाल नौतपा की शुरुआत ने ही अबूझमाड़ को झुलसा दिया है। बढ़ता पारा पूरे इलाके के लिए खतरे की घंटी है।
अबूझमाड़ को बचाने के 7 जरूरी सुझाव: -
1. हर हाथ एक पेड़-
इस मानसून हर व्यक्ति 5 पेड़ लगाए और बड़ा होने तक देखभाल करे।
जन्मदिन-त्योहार पर पौधे बांटें, केक नहीं।
स्कूल-पंचायत में वृक्षारोपण अभियान चलाएं।
2. जल-जंगल एक साथ बचाएं-
नदी-तालाब के किनारे पेड़ कटाई पर रोक लगे।
घर में पानी बर्बाद न करें, रेन वाटर हार्वेस्टिंग अपनाएं।
3. खनन पर निगरानी, टिकाऊ विकास-
ग्राम सभा की मंजूरी बिना खनन न होने दें। पेसा और वन अधिकार कानून का इस्तेमाल करें।
खनन के बदले ‘क्षतिपूर्ति वनीकरण’ की मांग करें, निगरानी खुद करें।
4. जंगल को आग से बचाएं
गर्मी में जंगल में बीड़ी-सिगरेट, माचिस न ले जाएं।
गांव में ‘फायर वॉचर्स’ टीम बनाएं और वन विभाग को तुरंत सूचना दें।
5. प्लास्टिक मुक्त अबूझमाड़-
जंगल-पहाड़ में कचरा न फेंके, साथ वापस लाएं।
सिंगल यूज प्लास्टिक, पॉलीथिन का इस्तेमाल बंद करें।
6.स्थानीय को अपनाएं-
कोदो, कुटकी, महुआ जैसी कम पानी वाली फसल उगाएं।
लकड़ी की जगह बांस और टिकाऊ सामग्री का इस्तेमाल बढ़ाएं।
7. जागरूक बनें, आवाज उठाएं
बच्चों को जंगल-पर्यावरण से जोड़ें, स्कूल में ‘इको क्लब’ बनाएं।
गलत लगे तो चुप न रहें, शांतिपूर्ण तरीके से विरोध दर्ज करें।
याद रखें: -
नौतपा हर साल आएगा, पर छांव तभी मिलेगी जब पेड़ बचेंगे। जंगल रहेगा तो जल रहेगा, जल रहेगा तो कल रहेगा। ????
धन्यवाद





