प्राकृतिक कीटनाशक सुरक्षित खेती, स्वस्थ फसल और स्वच्छ पर्यावरण की दिशा में प्रभावी पहल

नारायणपुर, छत्तीसगढ़

Jul 8, 2026 - 23:03
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प्राकृतिक कीटनाशक सुरक्षित खेती, स्वस्थ फसल और स्वच्छ पर्यावरण की दिशा में प्रभावी पहल

नारायणपुर, 08 जुलाई 2026 आधुनिक कृषि में फसल उत्पादन बढ़ाने के लिए रासायनिक कीटनाशकों का व्यापक उपयोग किया जा रहा है, लेकिन इनके अंधाधुंध एवं असंतुलित प्रयोग से मिट्टी की उर्वरता, पर्यावरण, जल स्रोतों और मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इसके साथ ही कई हानिकारक कीटों में रासायनिक कीटनाशकों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित होने लगी है, जिससे उनकी प्रभावशीलता लगातार घट रही है। ऐसी परिस्थितियों में प्राकृतिक कीटनाशक किसानों के लिए सुरक्षित, कम लागत वाले और पर्यावरण-अनुकूल विकल्प के रूप में तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं।

कृषि विज्ञान केंद्र, नारायणपुर के विषय वस्तु विशेषज्ञ (कीट विज्ञान) डॉ. आतल्या अफरोज ने बताया कि प्राकृतिक कीटनाशक पौधों, सूक्ष्मजीवों तथा अन्य प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त ऐसे पदार्थ हैं, जो फसलों को हानिकारक कीटों एवं रोगों से बचाते हैं। इनका सबसे बड़ा लाभ यह है कि ये लाभकारी कीटों, मिट्टी के सूक्ष्मजीवों और पर्यावरण को न्यूनतम नुकसान पहुंचाते हैं। यही कारण है कि प्राकृतिक खेती और जैविक कृषि में इनका विशेष महत्व है।

उन्होंने बताया कि प्राकृतिक कीटनाशकों के उपयोग से पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ जैव विविधता को भी बढ़ावा मिलता है। मधुमक्खी, मकड़ी और परजीवी कीट जैसे लाभकारी जीव सुरक्षित रहते हैं, जबकि फलों और सब्जियों में रासायनिक अवशेष नहीं रहते। इससे उपभोक्ताओं को सुरक्षित एवं गुणवत्तापूर्ण कृषि उत्पाद प्राप्त होते हैं। साथ ही मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है, उत्पादन लागत कम होती है तथा कीटों में प्रतिरोधक क्षमता विकसित होने की संभावना भी घट जाती है।

प्राकृतिक कीटनाशकों में नीमास्त्र, दशपर्णी अर्क, ब्रह्मास्त्र, अग्निअस्त्र, जीवामृत एवं घनजीवामृत प्रमुख हैं। नीमास्त्र तैयार करने के लिए नीम की पत्तियां, फल या बीज, देसी गाय का गोबर, गोमूत्र और स्वच्छ पानी का उपयोग किया जाता है। वहीं दशपर्णी अर्क दस प्रकार की औषधीय एवं कीटनाशी गुणों वाली पत्तियों से तैयार किया जाता है। ब्रह्मास्त्र और अग्निअस्त्र भी विभिन्न प्राकृतिक सामग्री से बनाए जाते हैं, जो तना छेदक, फल छेदक और अन्य चबाने वाले कीटों के नियंत्रण में प्रभावी माने जाते हैं। जीवामृत एवं घनजीवामृत मुख्य रूप से मिट्टी के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के साथ पौधों की रोग एवं कीट प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक होते हैं।

कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को सलाह दी है कि प्राकृतिक कीटनाशकों का छिड़काव सुबह या शाम के समय करें तथा हमेशा ताजा तैयार घोल का ही उपयोग करें। आवश्यकता अनुसार 7 से 10 दिन के अंतराल पर दोबारा छिड़काव करना चाहिए और वर्षा की संभावना होने पर छिड़काव से बचना चाहिए। यदि कीटों का प्रकोप अधिक हो तो समेकित कीट प्रबंधन (आईपीएम) तकनीक अपनाना अधिक लाभकारी रहेगा।

विशेषज्ञों ने किसानों से प्रत्येक मौसम में रासायनिक कीटनाशकों के स्थान पर प्राकृतिक विकल्पों को प्राथमिकता देने की अपील की है। उन्होंने कहा कि खेतों की नियमित निगरानी, फसल चक्र, फेरोमोन ट्रैप, पीले एवं नीले स्टिकी ट्रैप तथा जैविक नियंत्रण उपायों को अपनाकर कीट प्रबंधन को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों से प्राकृतिक कीटनाशकों का निर्माण कर किसान अपनी लागत भी कम कर सकते हैं। साथ ही कृषि विज्ञान केंद्र एवं कृषि विभाग द्वारा अनुशंसित तकनीकों का पालन कर टिकाऊ एवं लाभकारी खेती को बढ़ावा दिया जा सकता है।